सतत कृषि एवं ग्रामीण रोजगार

भारत में मवेशी आधारित कृषि अर्थव्यवस्था - एक गंभीर विरोधाभास

भारत, दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक (2024–25 में 247.87 मिलियन टन), जहां पशुपालन कृषि GVA का लगभग 31% योगदान देता है और 8 करोड़ से अधिक परिवारों का आधार है, फिर भी इस क्षेत्र को 10% से कम संस्थागत ऋण मिलता है क्योंकि पशु को गिरवी नहीं माना जाता। गांव एन ए एस पी पशुधन को वित्तीय संपत्ति मानते हुए Cattle Credit Score, डिजिटल पहचान और डेयरी-लिंक्ड फाइनेंस का समाधान देता है।

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Nitee Ranjan Pratap
द्वारा
09 Apr 2026 98 दृश्य 0 टिप्पणियां
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Cattle-Based Agricultural Economy in India – A Serious Paradox

भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है। वर्ष 2024-25 में देश में 247.87 मिलियन टन दूध का उत्पादन हुआ, जो पिछले वर्ष की तुलना में 3.58% अधिक है। पशुधन क्षेत्र कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के कुल सकल मूल्य वर्धन (GVA) में 30.87% योगदान देता है तथा राष्ट्रीय कुल GVA में लगभग 5.49% हिस्सा रखता है। आठ करोड़ से अधिक ग्रामीण परिवार सीधे डेयरी पशुपालन पर निर्भर हैं।

फिर भी इस सफलता की कहानी के बीच एक गंभीर विसंगति छिपी हुई है।

जो क्षेत्र कृषि GVA का लगभग एक-तिहाई हिस्सा संभाल रहा है, उसे संस्थागत ऋण का 10% से भी कम हिस्सा मिल पाता है। सबसे दर्दनाक सच्चाई यह है कि गाय और भैंस को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली में संपार्श्विक (collateral) के रूप में स्वीकार ही नहीं किया जाता।
गांव एन ए एस पी का संस्थापक होने के नाते मैं पिछले कई वर्षों से बिहार तथा देश के अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहा हूँ। हर दिन मैं देखता हूँ कि किसान अपनी सबसे मूल्यवान संपत्ति — अपनी गाय-भैंस — लेकर बैंक के काउंटर पर खड़ा होता है और बैंकर कहता है, “भाई, इसे collateral नहीं माना जा सकता।”
बिना पशुधन के टिकाऊ खेती अधूरी है।

  • गोबर मिट्टी की जैविक उर्वरता का आधार है।
  • दूध रोज की विश्वसनीय नकदी आय प्रदान करता है।
  • कई क्षेत्रों में बैल अभी भी खेती की शक्ति देते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण — फसल + डेयरी का एकीकृत मॉडल स्थिरता, पोषण सुरक्षा और निरंतर आय सुनिश्चित करता है।

यदि पशुधन भारतीय कृषि के लिए इतना केंद्रीय है, तो बैंकिंग प्रणाली इसमें शून्य बंधक मूल्य क्यों मानती है?

कारण स्पष्ट और व्यवस्थागत हैं:

  • पशुधन के लिए कोई औपचारिक, मानकीकृत मूल्यांकन प्रणाली नहीं।
  • डिजिटल पशु पहचान और ट्रैकिंग व्यवस्था का अभाव।
  • बीमा कवरेज कमजोर और स्वास्थ्य-टीकाकरण रिकॉर्ड सीमित।
  • चूक की स्थिति में कानूनी रिकवरी लगभग असंभव।

किसानों पर इसके परिणाम गंभीर हैं:

  • 3–5% मासिक ब्याज दर वाले अनौपचारिक सूदखोरों पर निर्भरता।
  • वित्तीय संकट में उत्पादक पशुओं की विवशता में बिक्री।
  • डेयरी विस्तार रुक जाना।
  • क्षेत्र की वास्तविक उत्पादकता क्षमता दब जाना।

यह कोई व्यक्तिगत किसान की समस्या नहीं — यह भारत की कृषि और ग्रामीण वित्त व्यवस्था में सबसे बड़ी नीतिगत खामी है।

गांव एन ए एस पी का प्रस्तावित समाधान
हमारा दृढ़ विश्वास है कि पशुधन को मान्यता प्राप्त वित्तीय संपत्ति (Recognized Financial Asset) का दर्जा दिया जाना चाहिए। इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए गांव एन ए एस पी ने चार स्तंभों पर आधारित व्यावहारिक मॉडल तैयार किया है:

(A) कैटल क्रेडिट स्कोर (CCS)

दूध उत्पादन, नस्ल की गुणवत्ता, स्वास्थ्य रिकॉर्ड, लैक्टेशन चक्र और मालिक की चुकौती इतिहास के आधार पर 300–900 अंकों का पारदर्शी स्कोरिंग सिस्टम — CIBIL की तर्ज पर।

(B) डिजिटल पशु पहचान

हर पशु के लिए Ear Tag + QR Code + RFID के माध्यम से अद्वितीय डिजिटल आईडी, जिसमें स्वास्थ्य, टीकाकरण और स्वामित्व रिकॉर्ड शामिल होंगे।

(C) पशुधन को वित्तीय संपत्ति के रूप में

समर्पित Hypothecation Framework, अनिवार्य बीमा लिंकेज और व्यावहारिक, समयबद्ध रिकवरी तंत्र का निर्माण।

(D) डेयरी-लिंक्ड फाइनेंसिंग मॉडल

सहकारी समितियों और निजी डेयरियों से दूध खरीद डेटा को सीधे चुकौती सुरक्षा के रूप में उपयोग करना, जिससे कम जोखिम और तेज ऋण संभव हो।

यह ढांचा मात्र एक व्यावसायिक नवाचार नहीं — यह राष्ट्रीय नीति नवाचार है, जो RBI, NABARD और मौजूदा सरकारी प्लेटफॉर्म्स के साथ एकीकृत किया जा सकता है।

मेरा आह्वान

यदि भारत आत्मनिर्भर कृषि और सच्ची ग्रामीण समृद्धि हासिल करना चाहता है, तो उसे पशुधन को बैंकेबल वित्तीय संपत्ति के रूप में तत्काल मान्यता देनी होगी।

“बिना पशुधन के कृषि अधूरी है — और बिना वित्त के पशुधन अर्थव्यवस्था असंभव है।”

गांव एन ए एस पी इस विजन के प्रति प्रतिबद्ध है। हम बिहार में एक लाख पशुओं को कवर करते हुए पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहे हैं, जिसमें उन्हें CCS स्कोर और डिजिटल आईडी प्रदान की जाएगी तथा छह महीनों के अंदर विश्वसनीय चुकौती प्रदर्शन दिखाया जाएगा।

मैं नीति-निर्माताओं, बैंकरों, डेयरी सहकारी समितियों, निजी डेयरी उद्यमों, कृषि-टेक स्टार्टअप्स और उन सभी किसानों को आमंत्रित करता हूँ जो इस विजन में विश्वास रखते हैं — आइए, हाथ मिलाएँ।

यह मात्र एक मॉडल नहीं है।
यह ग्रामीण भारत की असली क्रांति की शुरुआत है।
जय जवान, जय किसान, जय गौ-माता।

संस्थापक एवं दूरदर्शी
गांव एन ए एस पी
(गाँव की नई सोच – पशुधन को आर्थिक इंजन बनाना)

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