बदलते जलवायु परिदृश्य में भारतीय कृषि: अब किसानों को परिवर्तन का नेतृत्व करना होगा
जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, बाढ़ और सूखा भारतीय कृषि के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर रहे हैं। ऐसे समय में केवल पारंपरिक धान और गेहूं आधारित खेती पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। किसानों को कम पानी वाली फसलों, डेयरी आधारित एकीकृत कृषि, मूल्य संवर्धन और निर्यात उन्मुख खेती की ओर बढ़ना होगा। भविष्य उन्हीं किसानों का है जो बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालते हुए आत्मनिर्भर, नवाचारी और बाजार उन्मुख कृषि मॉडल अपनाएंगे।
भारतीय कृषि एक अभूतपूर्व अनिश्चितता के दौर में प्रवेश कर रही है। कम वर्षा, असमय अत्यधिक बारिश, बाढ़, सूखा, लू और बढ़ता तापमान खेती की उत्पादकता तथा ग्रामीण आजीविका को लगातार प्रभावित कर रहे हैं। जलवायु वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले वर्षों में मौसम की चरम घटनाएँ और अधिक तीव्र तथा बार-बार देखने को मिल सकती हैं। ऐसे समय में केवल पारंपरिक धान और गेहूं की खेती पर निर्भर रहना देश के करोड़ों किसानों के लिए जोखिमपूर्ण होता जा रहा है।
समय की मांग है कि भारतीय किसान अपनी कृषि रणनीति पर पुनर्विचार करें और जलवायु परिवर्तन की वास्तविकताओं के अनुरूप स्वयं को ढालें। कम पानी में होने वाली तथा अधिक तापमान सहन करने वाली फसलों को भविष्य की खेती का हिस्सा बनाना होगा। मोटे अनाज (मिलेट्स), दलहन, तिलहन, मसाले, औषधीय पौधे, फल एवं सब्जियाँ ऐसे विकल्प हैं जो किसानों को बेहतर आय प्रदान करने के साथ-साथ जलवायु संबंधी जोखिमों को भी कम कर सकते हैं।
साथ ही कृषि को केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं रखना चाहिए। डेयरी आधारित एकीकृत कृषि मॉडल किसानों को अधिक स्थिरता और टिकाऊ आय प्रदान कर सकता है। पशुपालन, जैविक खाद उत्पादन, बायोगैस, चारा उत्पादन और फसल खेती एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं। जब आय का एक स्रोत प्रभावित होगा, तब दूसरा स्रोत परिवार की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।
वैश्विक स्तर पर कृषि उत्पादों की मांग तेजी से बदल रही है। निर्यात उन्मुख खेती भारतीय किसानों के लिए एक बड़ा अवसर बनकर उभर रही है। मसाले, शहद, फल, सब्जियाँ, दुग्ध उत्पाद, औषधीय पौधे, जैविक उत्पाद तथा मूल्य संवर्धित कृषि उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग लगातार बढ़ रही है। यदि किसान गुणवत्ता मानकों, ट्रेसबिलिटी, सामूहिक उत्पादन, प्रसंस्करण और बाजार संपर्क पर ध्यान दें, तो भारत वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था में अपनी हिस्सेदारी को काफी बढ़ा सकता है।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यह परिवर्तन लाएगा कौन?
क्या केवल सरकार?
क्या केवल संस्थाएँ?
क्या केवल योजनाएँ और सब्सिडी?
सच्चाई यह है कि सरकारें नीतियाँ बना सकती हैं, सहायता प्रदान कर सकती हैं और अवसर उपलब्ध करा सकती हैं, लेकिन वे किसान की दूरदर्शिता और निर्णय क्षमता का स्थान नहीं ले सकतीं। भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी केवल धन नहीं है, बल्कि नई सोच, नई तकनीकों और नए बाजारों को अपनाने की इच्छा है।
चाहे सुपर एल-नीनो हो, अत्यधिक वर्षा, बाढ़, सूखा या लंबे समय तक चलने वाली गर्मी की लहरें—मौसम की परिस्थितियाँ बदलती रहेंगी। जलवायु परिवर्तन किसी का इंतजार नहीं करेगा। इसलिए किसानों को भी बदलना होगा। जो किसान अपनी फसलों का चयन, जल प्रबंधन, उत्पादन प्रणाली और बाजार रणनीति समय के अनुसार बदलेंगे, वही आने वाले वर्षों में सफल होंगे।
यह शिकायत करने का समय नहीं, बल्कि तैयारी करने का समय है। सरकारी सहायता महत्वपूर्ण है, लेकिन किसानों को अपने भविष्य को पूरी तरह बाहरी एजेंसियों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। तेजी से बदलती दुनिया में आत्मनिर्भर और परिवर्तनशील किसान ही सबसे मजबूत किसान होगा।
भारतीय किसानों के सामने चुनौतियाँ बड़ी हैं, लेकिन अवसर भी उतने ही बड़े हैं। निर्णय हमें करना है कि हम बदलती परिस्थितियों के शिकार बनेंगे या कृषि परिवर्तन के नेतृत्वकर्ता।
भविष्य उन्हीं कृषि प्रणालियों का है जो कम पानी का उपयोग करें, अधिक तापमान सहन करें, बाजार की मांग को समझें, निर्यात के अवसरों का लाभ उठाएँ और किसान परिवारों को स्थायी आय प्रदान करें।
अब समय आ गया है कि हम धान और गेहूं की पारंपरिक सोच से आगे बढ़ें और जलवायु-अनुकूल, बाजार उन्मुख, विविधीकृत तथा एकीकृत कृषि मॉडल को अपनाएँ। भविष्य का किसान केवल फसल उत्पादक नहीं होगा, बल्कि कृषि, डेयरी, प्राकृतिक संसाधनों और बाजार अवसरों का प्रबंधन करने वाला एक उद्यमी होगा।
भारतीय कृषि का भविष्य केवल जलवायु परिवर्तन से तय नहीं होगा, बल्कि इस बात से तय होगा कि किसान स्वयं को बदलती परिस्थितियों के अनुसार कितनी तेजी से ढालते हैं।
लेखक:
नीती रंजन प्रताप
संस्थापक, GAON NASP
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